पूर्वी दून घाटी की जीवनरेखा सौंग नदी की सेहत और उसकी पारिस्थितिकी का पता लगाने के लिए जैविक संकेतकों के आधार पर अध्ययन शुरू किया गया है। स्प्रिंग एंड रिवर रिजुविनेशन अथॉरिटी (सारा) के तहत शुरू हुए इस बायो इंडिकेटर प्रोजेक्ट में पांच प्रमुख जीव-समूहों के जरिए नदी के पानी की गुणवत्ता, नदी किनारे के प्राकृतिक आवास और मानवीय गतिविधियों के प्रभावों का आकलन किया जाएगा। इसके लिए सौंग नदी के उद्गम से गंगा संगम तक करीब 80 किलोमीटर क्षेत्र में 36 स्थानों पर दो अलग-अलग मौसमों में सर्वेक्षण किया जाएगा। अध्ययन से नदी की मौजूदा स्थिति का वैज्ञानिक डेटाबेस तैयार होगा, जो प्रस्तावित सौंग बांध, खनन और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के प्रभावों को समझने में भी मददगार होगा।
इस अध्ययन को भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के पूर्व वरिष्ठ प्राध्यापक एवं वैज्ञानिक ‘जी’ डॉ. वीपी उनियाल के मार्गदर्शन में पूरा किया जाएगा। इसके तहत नदी की पारिस्थितिकी को समझने के लिए जलीय मैक्रोइनवर्टेब्रेट्स, मधुमक्खियों, ड्रैगनफ्लाई और डेम्सलफ्लाई (ओडोनाटा) तथा पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों का अध्ययन किया जाएगा। इन जीवों की मौजूदगी और उनकी विविधता से जल की गुणवत्ता तथा आसपास के पर्यावरण की स्थिति का पता लगाया जा सकेगा।
तीन जोन में बांटी गई नदी
अध्ययन के लिए सौंग नदी को ऊपरी, मध्य और निचले तीन जोन में बांटा गया है। प्रत्येक जोन में 12-12 स्थायी सर्वेक्षण केंद्र बनाए गए हैं। इस तरह कुल 36 स्थानों पर अध्ययन किया जाएगा। सर्वेक्षण नदी के उद्गम कद्दूखाल (टिहरी) से लेकर गंगा संगम के निकट तेहरी फार्म (देहरादून) तक किया जाएगा।
दो मौसमों में जुटाए जाएंगे आंकड़े
छह माह की इस परियोजना का फील्ड वर्क नवंबर से अप्रैल के बीच पूरा किया जाएगा। इसके तहत मानसून के बाद और मानसून से पहले दो चरणों में सर्वेक्षण होगा। दोनों मौसमों में जुटाए गए आंकड़ों के तुलनात्मक अध्ययन से नदी और उसके आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र में होने वाले बदलावों को समझने में मदद मिलेगी।
परियोजना के तहत तैयार होने वाला बेसलाइन डेटाबेस सौंग नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन की योजनाएं तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसके वैज्ञानिक निष्कर्षों के आधार पर नदी पर बांध निर्माण, खनन और शहरीकरण जैसी गतिविधियों के प्रभावों का आकलन कर संरक्षण के लिए ठोस नीतियां बनाने में मदद मिलेगी।

