रक्षा मंत्रालय की ओर से राष्ट्रीय रंगशाला शिविर, नई दिल्ली में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान विभिन्न राज्यों एवं मंत्रालयों की प्रस्तावित झांकियों का प्रेस के समक्ष प्रदर्शन किया गया। इस दौरान जानकारी दी गई कि उत्तराखण्ड राज्य की झांकी इस वर्ष आत्मनिर्भर उत्तराखण्ड थीम पर आधारित होगी, जिसे भारत पर्व के अंतर्गत प्रदर्शित किया जाएगा।
भारत पर्व का आयोजन 26 से 31 जनवरी तक दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले में किया जाएगा। इस दौरान देश-विदेश से आने वाले दर्शक उत्तराखण्ड की विकास यात्रा, सांस्कृतिक विरासत और आत्मनिर्भरता की झलक एक ही मंच पर देख सकेंगे।
सूचना विभाग के संयुक्त निदेशक एवं झांकी के नोडल अधिकारी के.एस. चौहान ने बताया कि झांकी के ट्रैक्टर सेक्शन में उत्तराखण्ड के पारंपरिक वाद्य यंत्र ढोल और रणसिंघा की आकर्षक तांबे की प्रतिकृतियां प्रदर्शित की गई हैं, जो राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और शिल्पकारों की कलात्मक दक्षता को दर्शाती हैं।
झांकी के ट्रेलर सेक्शन के पहले भाग में तांबे के मंजीरे की भव्य प्रतिमा लगाई गई है, जो तांबे की पारंपरिक कला की बारीकियों को उजागर करती है। मध्य भाग में गागर, सुरही और कुण्डी जैसे पारंपरिक तांबे के बर्तनों को प्रदर्शित किया गया है, जो उत्तराखण्ड के पारंपरिक घरेलू जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। वहीं, साइड पैनलों पर पारंपरिक वाद्ययंत्र भोंकोर के चित्रांकन सांस्कृतिक कथा को और प्रभावी बनाते हैं।
झांकी के अंतिम भाग में तांबे के कारीगर की सजीव मूर्ति दिखाई गई है, जो हाथ से तांबे के बर्तन बनाते हुए श्रम, कौशल और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का प्रतीक प्रस्तुत करती है। इसके चारों ओर सजे तांबे के बर्तन उत्तराखण्ड के शिल्पी समुदाय की मेहनत और आत्मनिर्भरता की कहानी बयां करते हैं।
चौहान ने बताया कि यह झांकी उत्तराखण्ड के शिल्पी समुदाय की कारीगरी, सांस्कृतिक योगदान, आजीविका, कौशल और परंपराओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। स्थानीय कारीगरों द्वारा पारंपरिक तकनीकों से निर्मित तांबे के बर्तन न केवल उत्कृष्ट शिल्प कौशल का उदाहरण हैं, बल्कि राज्य के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में भी इनका विशेष स्थान रहा है।
उत्तराखण्ड की यह झांकी राज्य की प्राचीन शिल्प परंपरा, सांस्कृतिक समृद्धि और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को जीवंत रूप में देश-दुनिया के सामने प्रस्तुत करेगी।
